कोरोना वायरस के संक्रमण से इस वक्त पूरी दुनिया जूझ रही है। कोरोना वायरस का प्रकोप दुनिया के करोड़ों लोगों का जीवन नाटकीय अंदाज़ में बदल रहा है. हालांकि, ऐसा पहली बार नहीं हुआ है जब पूरी दुनिया किसी महामारी से जूझ रही है। इससे पहले भी कई बार भयानक महामारी से लाखों लोगों की जान जा चुकी है।
तारीख़ के पन्ने महामारियों के कारण इतिहास बदलने की मिसालों से भरे पड़े हैं. बीमारियों की वजह से कई सल्तनतें तबाह हो गईं. साम्राज्यवाद का विस्तार भी हुआ और इसका दायरा सिमटा भी. और यहां तक कि दुनिया के मौसम में भी इन बीमारियों के कारण उतार-चढ़ाव आते देखा गया.
आइए इतिहास के उन महामारियों के बारे में जानते हैं, जिसने दुनियां के इतिहास को बदलने की कुछ मिसालें कायम की हैं-
1. प्लेग से यूरोप में मौत का तांडव
चौदहवीं शताब्दी के पांचवें और छठें दशक में प्लेग ने ऐसी तबाही मचाई कि यूरोप में एक तिहाई लोगों की जान चली गई थी। इसे ब्यूबोनिक प्लेग या ब्लैक डेथ के नाम से भी जाना जाता है। दसियों लाख जानें लेने वाली यह महामारी, कई यूरोपीय देशों के लिए वरदान साबित हुई। इस महामारी से कृषि करने वाले किसान और मज़दूरों की कमी होने लगी। इससे ज़मींदारों को दिक़्क़त होने लगी. जो किसान बचे थे उनके पास ज़मींदारों से सौदेबाज़ी की क्षमता बढ़ गई। इसका नतीजा ये हुआ कि पश्चिमी यूरोप के देशों की सामंतवादी व्यवस्था टूटने लगी। इस बदलाव ने मज़दूरी पर काम करने की प्रथा को जन्म दिया। इसी प्रथा से दिहाड़ी पर काम करने वाले नियम की शुरुआत हुई। इससे न सिर्फ लोगों को काम मिला बल्कि अर्थव्यवस्था भी सुधरी। बहुत से देशों ने खुद को हर लिहाज़ से इतना आगे बढ़ाया कि वो आज दुनिया के अमीर मुल्कों में शुमार होते हैं।
इस बदलाव ने मज़दूरी पर काम करने की प्रथा को जन्म दिया। जिसके कारण पश्चिमी यूरोप ज़्यादा आधुनिक, व्यापारिक और नक़दी आधारित अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ चला। चूंकि अब ज़मींदारों के लिए मज़दूरों की मज़दूरी देना महंगा पड़ रहा था.
इसी मजबूरी ने उन्हें ऐसी तकनीक में निवेश करने के लिए बाध्य किया, जिसमें ख़र्च कम लगे। मज़दूरों की कम ज़रूरत हो और काम पूरा हो जाए. ताकि लागत कम कर के पैसा बचाया जा सके। यहीं से पश्चिमी यूरोपीय देशों में साम्राज्यवाद की शुरुआत हुई।
यूरोप के लोग अपने यहां प्लेग से इतनी मौतें देख चुके थे कि उनके मन से मौत का डर निकल गया था, और वे नई दुनिया की तलाश में यूरोप के बाहर निकले और अपनी अर्थव्यवस्था को और बढ़ाया। फिर उन्होंने उपनिवेशवाद की भी शुरूवात कर दी।
लिहाज़ा कहा जा सकता है कि प्लेग के बाद पश्चिमी यूरोप में नई ऊर्जा आई, और अर्थव्यवस्था के आधुनिकीकरण ने उन्हें नई तकनीक विकसित करने को मजबूर किया। उन्होंने उपनिवेश बनाए और वहां से जो कमाई की, उसके बूते ही पश्चिम यूरोपीय देश दुनिया में ताक़तवर बनकर उभरे। आज भी उसी तरक़्क़ी के बूते पश्चिम यूरोप के बहुत से देश दुनिया में अपना दबदबा बनाए हुए हैं।
2. चीन में मिंग प्लेग का प्रकोप
चीन में मिंग राजवंश ने लगभग तीन सौ साल तक राज किया था। लेकिन, एक प्लेग महामारी ने इस बेहद ताक़तवर राजवंश के पतन में अहम भूमिका अदा की। वर्ष 1641 में उत्तरी चीन में प्लेग की वजह से बड़ी संख्या में लोगों की जान चली गई। कुछ इलाक़ो में तो प्लेग की वजह से 20 से 40 प्रतिशत आबादी ख़त्म हो गई।
चीन में प्लेग ने उस वक़्त दस्तक दी, जब वहां सूखा और टिड्डियों की वजह से तबाही मची हुई थी। फ़सलें तबाह हो चुकी थी। लोगों के पास खाने को अनाज नहीं था। हालात इतने बिगड़ गए थे कि जब लोगों को खाने को कुछ नहीं मिला, तो, लोगों ने प्लेग, भुखमरी और सूखे से मर चुके लोगों की लाशों को ही नोचकर खाने लगे थे।
चीन में यह संकट, मलेरिया और प्लेग जैसी बीमारियों के एक साथ फैलने की वजह से पैदा हुआ था। ऐसा भी अनुमान लगाया जाता है कि, चीन में ये बीमारियां उत्तर से आने वाले आक्रमणकारियों के साथ आईं और इन्हीं आक्रमणकारियों ने चीन से मिंग राजवंश को पूरी तरह उखाड़ फेंका।
शुरुआत में तो चीन पर ये हमले डाकुओं और लुटेरों ने ही शुरु किए थे। लेकिन बाद में मंचूरिया राजवंश के राजाओं ने संगठित तरीक़े से चीन पर आक्रमण किया और मिंग राजवंश को हमेशा के लिए ख़त्म कर दिया।
वैसे तो चीन के मिंग राजवंश के ख़ात्मे के लिए सूखा और भ्रष्टाचार जैसे कारक भी ज़िम्मेदार थे। लेकिन भयानक बीमारियों और महामारियों के प्रकोप ने भी इसके ख़ात्मे में अहम रोल निभाया।
3. चेचक से अमरीका में विनाश
यूरोपीय देशों ने पंद्रहवीं सदी के अंत तक अमेरिकी महाद्वीपों में उपनिवेशवाद का प्रसार करते हुए अपना साम्राज्य स्थापित कर लिया था। अपने साम्राज्य के विस्तार के चक्कर में यूरोपीय ताक़तों ने यहां बहुत लोगों को मारा।
ब्रिटेन में यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ़ लंदन के वैज्ञानिकों ने एक अध्ययन में पाया कि यूरोप के विस्तार के बाद अमेरिका की क़रीब छह करोड़ की आबादी केवल एक सदी में घट कर महज़ साठ लाख रह गई।
अमरीका में यूरोपीय उपनिवेश स्थापित होने के बाद इन इलाक़ों में होने वाली अधिकतर मौतों के लिए वे बीमारियां भी ज़िम्मेदार थीं, जो ये उपनिवेशवादी अपने साथ लेकर आये थे। इनमें सबसे बड़ी बीमारी थी चेचक। अन्य बीमारियों में ख़सरा, हैज़ा, मलेरिया, प्लेग, काली खांसी, और टाइफ़स भी शामिल थीं, जिन्होंने करोड़ों लोगों की जान ली। इन बीमारियों का नतीजा सारी दुनियां को भुगतना पड़ा।
वैज्ञानिक मानते हैं कि अमेरिका में बढ़ी हरियाली के साथ, बड़े पैमाने पर ज्वालामुखियों के विस्फोट और सूरज की गतिविधियों में कमी के चलते भी दुनिया के तापमान में कमी आई, और, दुनियां एक ऐसे दौर की तरफ़ बढ़ती चली गई जिसे हम 'लिटिल आईस एज' या 'लघु हिमयुग' के नाम से जानते हैं।
4. येलो फ़ीवर से फ़्रांस के हज़ारों सैनिक मारे गए
कैरेबियाई देश हैती में एक महामारी के प्रकोप ने उस समय की बड़ी साम्राज्यवादी ताक़त फ्रांस को उत्तरी अमरीका से बाहर करने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई थी। और इसी के बाद अमरीका का एक बड़े और ताक़तवर देश के तौर पर विकास हुआ था, और वह महाशक्ति बनने की दिशा में आगे बढ़ चला था।
1801 में कैरेबियाई देश हैती में यूरोप की औपनिवेशिक ताक़तों के ख़िलाफ़ यहां के बहुत से ग़ुलामों ने बग़ावत कर दी। एक के बाद एक कई बग़ावतों के बाद आख़िरकार तुसैंत लोवरतूर का फ़्रांस के साथ समझौता हो गया और वो हैती का शासक बन गया।
लेकिन पीत ज्वर या येलो फ़ीवर के प्रकोप से ख़ुद को नहीं बचा पाए। एक अंदाज़े के मुताबिक़ फ़्रांस के क़रीब पचास हज़ार सैनिक, अधिकारी, डॉक्टर इस बुखार की चपेट में आकर मौत के मुंह में समा गए। हैती पर क़ब्ज़े के लिए गए फ्रांसीसी सैनिकों में से महज़ तीन हज़ार लोग ही फ़्रांस लौट सके।
यूरोप के सैनिकों के पास क़ुदरती तौर पर इस बुख़ार को झेलने की वो ताक़त नहीं थी जो अफ़्रीकी मूल के लोगों में थी. इस हार ने नेपोलियन को ना सिर्फ़ हैती का उपनिवेश छोड़ने पर मजबूर किया, बल्कि, नेपोलियन ने उत्तरी अमरीका में फ्रांस के औपनिवेशिक विस्तार के अपने ख़्वाब को भी तिलांजलि दे दी।
हैती पर क़ब्ज़े के नाकाम अभियान के दो साल बाद ही फ़्रांस के लीडर ने 21 लाख मिलियन वर्ग किलोमीटर इलाक़े वाले कैरेबियाई द्वीप को अमरीका की नई सरकार को बेच दी। इसे लुईसियाना पर्चेज़ के नाम से भी जाना जाता है। जिसके बाद नए देश अमरीका का इलाक़ा बढ़ कर दोगुना हो गया।
उधर, फ्रांस में नेपोलियन बोनापार्ट ने ख़ुद को आजीवन देश का शासक घोषित कर दिया था। नेपोलियन ने पूरे हैती द्वीप पर अपना क़ब्ज़ा जमाने की सोचा, लिहाज़ा उसने हैती पर कब्ज़ा जमाने के लिए दसियों हज़ार सैनिकों को वहां लड़ने के लिए भेज दिया। फ़्रांस से आए ये लड़ाकू जंग के मैदान में तो बहुत बहादुर साबित हुए।
5. अफ़्रीक़ा में राइंडरपेस्ट वायरस का कहर
1888 और 1897 के बीच अफ़्रीक़ा में राइंडरपेस्ट नाम के वायरस के कारण पशुओं के बीच एक महामारी फैली थी, जिसे जानवरों में होने वाला प्लेग भी कहा जाता है। इस महामारी ने जानवरों को बड़े पैमाने पर अपना शिकार बनाया। बड़े पैमाने पर जानवरों की मौत से हॉर्न ऑफ़ अफ्रीका, पश्चिमी अफ्रीका और दक्षिणी-पश्चिमी अफ्रीका में रहने वाले बहुत से लोगों की जान पर बन आई। हालांकि इस प्रकोप का असर सीधे इंसान की मौत पर नहीं पड़ा, लेकिन, राइंडरपेस्ट नाम के वायरस ने अफ़्रीक़ा में लगभग 90 प्रतिशत पालतू जानवरों को ख़त्म कर दिया। जिसकी वजह से खेती प्रभावित हुई और भुखमरी फैल गई। चूंकि लोग खेती के लिए बैलों का इस्तेमाल करते थे। जब बैल ही नहीं रहे तो खेती भी ख़त्म होने लगी। अफ़्रीक़ा के ऐसे बदतर हालात ने उन्नीसवीं सदी के आख़िर में यूरोपीय देशों को अफ्रीका के एक बड़े हिस्से पर अपने उपनिवेश स्थापित करने का माहौल तैयार कर दिया.
ब्रिटेन, फ़्रांस, जर्मनी, पुर्तगाल, बेल्जियम और इटली ने अफ़्रीक़ा में अपने-अपने उपनिवेश स्थापित करने को लेकर एक समझौता किया था और आपस में उन्होंने यह तय किया था कि अफ्रीका के किस हिस्से में कौन सा देश अपना साम्राज्य स्थापित करेगा।
वर्ष 1900 तक अफ्रीका के 90 प्रतिशत हिस्से पर औपनिवेशिक ताक़तों का नियंत्रण हो गया था।
